शुक्रवार, 21 दिसम्बर, 2012 ई. के बाद शनिवार, 22 दिसम्बर, 2012 ई.से
पाँचवें, प्रथम और अन्तिम स्वर्णयुग का आरम्भ
1. काल, समय या युग परिवर्तन कब होगा? कैसे होगा और किस मानव षरीर के द्वारा होगा?
2. और भविश्य के प्रति जिज्ञासा मानव स्वभाव का सबसे रूचिकर विशय है।
3. इस आधार पर अनेक व्यापार भी चल रहें हैं।
उपरोक्त प्रष्नों के हल को पाने के लिए हमें मानव सभ्यता के प्रारम्भ से चले आ रहे और समय-समय पर अन्य धर्म षास्त्रों के मान्यताओं तथा भविश्यवक्ताओं के विशय में जानना आवष्यक होगा।
Ø हिन्दू शास्त्र व मान्यता के अनुसार
प्राचीन हिन्दू खगोलीय और पौराणिक पाठ्यों में वर्णित समय चक्र आश्चर्यजनक रूप से एक समान है।
प्राचीन भारतीय भार और मापन पद्धतियाँ,
अभी भी प्रयोग में हैं।
इसके साथ-साथ ही हिन्दू ग्रन्थों में लम्बाई, भार, क्षेत्रफल मापन कह भी इकाईयाँ परिमाण सहित उल्लेखित हैं।
हिन्दू समय मापन (काल व्यवहार) में नाक्षत्रीय मापन, वैदिक समय इकाईयाँ, चाँद्र मापन, ऊँश्ण कटिवन्धीय मापन, पितरों की समय गणना, देवताओं की काल गणना, पाल्या इत्यादि हैं।
हिन्दू पुराण के अनुसार ब्रह्माण्ड का सृजन क्रमिक रूप से सृश्टि के ईष्वर ब्रह्मा द्वारा होता है जिनकी जीवन 100 ब्राह्म वर्श होता है।
ब्रह्मा के 1 दिन को 1 कल्प कहते हैं।
1 कल्प, 14 मनु (पीढ़ी) के बराबर होता है।
1 मनु का जीवन मनवन्तर कहलाता है और 1 मनवन्तर में 71 चतुर्युग (अर्थात 71 बार चार युगों का आना-जाना) के बराबर होता है। ब्रह्मा का एक कल्प (अर्थात 14 मनु अर्थात 71 चतुर्युग) समाप्त होने के बाद ब्रह्माण्ड का एक क्रम) समाप्त हो जाता है और ब्रह्मा की रात आती है।
फिर सुबह होती है और फिर एक नया कल्प षुरू होता है।
इस प्रकार ब्रह्मा 100 वर्श व्यतीत कर स्वयं विलिन हो जाते हैं।
और पुनः ब्रह्मा की उत्पत्ति होकर उपरोक्त क्रम का प्रारम्भ होता है।
वर्तमान समय ब्रह्मा का 58वें वर्श का प्रथम दिन तथा सातवें मनु- वैवस्वत और उसके 28वें चतुर्युग का अन्तिम युग- कलियुग का समय है।
विष्व का सृजन, विनाष और पुनः सृजन प्रत्येक 43,20,000 वर्श के बाद होता है।
जो एक के बाद एक आने वाले चार युग क्रमषः 1. सतयुग (स्वर्णयुग, आयु-1728000 वर्श), 2. त्रेतायुग (रजतयुग, आयु-1296000 वर्श), 3. द्वापरयुग (वाम्रयुग, आयु-864000 वर्श), 4. कलियुग (लौहयुग, आयु-432000 वर्श) है। प्रथम युग के बाद आने वाला युग अपने पहले के युग से कम आयु का होता है। ये चारो युग 25,920 वर्श के चक्र में विभाजित होते हैं। प्रत्येक चक्र में चार राषियाँ क्रमषः कुंभ, वृश, सिंह और वृष्चिक बारी – बारी से आते-जाते हैं। चारो राषि चक्र को संयुक्त रूप से राषि चक्र (जोडिएक साइकिल) कहते हैं। प्रत्येक राषि 25,920 वर्श के चैथे हिस्से 6,480 (या 6,500) वर्श में आना-जाना होता है। इस समय हमारा प्रवेष कुंभ राषि में हो रहा है।
चतुर्युग के युगों में विषेश कला के साथ विश्णु के अवतार होते हैं। वर्तमान चतुर्युग में भगवान विश्णु के अभी तक 9 अवतार क्रमषः मत्स्य, वाराह, नृसिंह, वामन, परषुराम, राम, कृश्ण व बुद्ध हो चुके हैं। दसवाँ कल्कि अन्तिम महाअवतार अभी होना है जो सफेद घोड़े पर सवार होकर हाथ में तलवार लेकर समस्त बुराईयों का नाष करेगें, ऐसी मान्यता है। (इन अवतारों के विशय में हम आगे विस्तृत रूप से पढ़ेगें)
ब्रह्मवैवर्त, विश्णु, भागवत, पद्म, गरूण तथा भविश्य पुराण में भगवान विश्णु के दसवें तथा महावतार ”कल्कि“ का वर्णन है। कहा गया है कि कलियुग षुरू होने के 5000 वर्श बाद, 10,000 वर्शो तक भक्ति का प्रभाव बढ़ेगा। इस प्रकार कलियुग के लगभग 6898 वर्श पहले ही पुरे हो चुके हैं तथा 18 फरवरी, 3102 को ये समाप्त होगा। कलियुग के अन्त से भगवान विश्णु के अवतार से जुड़ी तथा षिव की भविश्यवाणीयां हैं, जो सृश्टि के संहारक व सर्जक हैं।
वर्तमान तिथि – हम वर्तमान में ब्रह्मा के 58वें वर्श में 7वें मनु-वैवस्वत मनु के शासन में श्वेतवाराह कल्प के द्वितीय परार्ध में, 28वें चतुर्युग का अन्तिम युग-कलियुग के ब्रह्मा के प्रथम वर्श के प्रथम दिवस में विक्रम सम्वत् 2069 (सन् 2012 ई0) में हैं। वर्तमान कलियुग ग्रेगोरियन कैलेण्डर के अनुसार दिनांक 17-18 फरवरी को 3102 ई.पू. में प्रारम्भ हुआ था। इस प्रकार अबतक 15 नील, 55 खरब, 21 अरब, 97 करोड़, 61 हजार, 624 वर्श इस ब्रह्मा के सृजित हुए हो गये हैं
3. अन्य के अनुसार
दिनांक 24 अक्टूबर 1995 से 16 जुलाई 2000 तक का समय सर्वाधिक खगोलीय घटनाओं वाला समय रहा है। जिसमें 24 अक्टूबर 1995 अमावस्या दीपावली के दिन पूर्ण सुर्यग्रहण, 18 से 22 नवम्बर 1997 (पाँच दिन) तक आठ ग्रहों का 130 डिग्री के बीच आना फरवरी व मार्च 1999 में एक ही महीनें में दो पूर्ण चाँद, 11 अगस्त 1999 को पूर्ण सूर्य ग्रहण, 18 नवम्बर 1999 को उल्काओं की आतिषबाजी का नजारा, 22 दिसम्बर 1999 को 133 वर्श बाद सबसे बड़ा चाँद, 5 मई 2000 को 26 डिग्री के बीच सूर्य-चाँद सहित पाँच ग्रहों का आना और 16 जुलाई 2000 गुरुपूर्णिमा के दिन ही पूर्ण चन्द्रग्रहण है। इसके अलावा सन् 1995 के अन्त में गणेष जी का दूध पीना तथा उत्तर भारत के षिव मन्दिरों में स्थित षिवलिंगों का रंग बदलना जिससे तीसरे नेत्र के खुलने का अनुमान अलग घटना है। (देखें- ”अमर उजाला“ इलाहाबाद संस्करण 25-6-1999) उपरोक्त अवधि के 1999 में ही सावन मास का मलमास या पुरुशोत्तम मास या अधिक मास या अधिमास के रुप में षिवभक्ति के लिए अतिरिक्त माह हुआ है। भारत के लिए उपरोक्त समय में ही स्वतन्त्रता और संविधान के 50 वर्श भी पूरे हुए हैं। 14-15 अगस्त 1947 की रात जब भारत स्वतन्त्र हुआ था तब आठों ग्रह सहित सूरज चाँद अर्थात् पूरा सौरमण्डल भारत के आकाष में अनुपस्थित था जबकि उपरोक्त समय के स्वतन्त्रता दिवस 15 अगस्त 1999 को मंगल और चाँद को छोड़ सभी ग्रह और तारे पहली बार लाल किले पर झण्डा फहराने के समय उपस्थित थे। (देखें- ”दैनिक जागरण“ वाराणसी संस्करण, दिनांक 15-08-1999) इतना ही नहीं उपरोक्त समय में ही ईसाई, ईस्लाम और हिन्दू का महत्वपूर्ण दिन क्रमषः नया वर्श 1 जनवरी 1998, रमजान का प्रारम्भ और वृहस्पतिवार (विश्णु का दिन) प्रथम बार एक ही दिन संयोग हुआ। उपरोक्त समय में ही ऐतिहासिक षिकागो वकृतता के बाद स्वामी विवेकानन्द के भारत लौटने का 100 वर्श भी पूर्ण हुआ। उपरोक्त समय में ही षिकागो वकृतता के समय स्वामी विवेकानन्द के उम्र 30 वर्श 7 माह 29 दिन के बराबर उम्र लवकुष सिंह ”विष्वमानव“ ने 15 जून 1998 को पूर्ण किया है। 26 अक्टुबर 2000 को दिपावली तथा मुसलमानो का ज्योति पर्व ”मेराजुन्नबी“ की एकता। 17 नवम्बर 2000 को लियो (सिंह) राषि की ओर से उल्कापात, 13 दिसम्बर को जेमिनी (मिथुन) राषि की ओर से उल्कापात भी अलग घटना है।
खगोल व ज्योतिश विज्ञान के अनुसार उपरोक्त घटनायें युग की समाप्ति और भगवान के अवतरण के समय का सूचक होती हैं। वर्तमान कलियुग की आयु 4,32,000 वर्श मानी गयी है। जिसका प्रारम्भ 18 फरवरी 3102 ई0 पू0 माना जाता है। सर्वज्ञपीठम् कालीमठ, वाराणसी के स्वामी ब्रह्मानन्द नाथ सरस्वती के अनुसार ग्रहण से उत्पादित पुण्य से कलियुग का 10,000 वर्श आयु कम हो जाता है। (देखें- ”अमर उजाला“ इलाहाबाद संस्करण, दिनांक- 11-08-1999 पूर्ण सूर्यग्रहण के अवसर पर प्रकाषित) और 821 वर्श कलियुग का षेश रहने पर कल्कि अवतार का अवतरण माना गया है। इस प्रकार कलियुग का व्यतीत कुल वर्श 5102 वर्श हुआ और यदि कल्कि अवतार अभी होता है तो कलियुग के कुल आयु 4,32,000 में से 5102$821 वर्श घटकर 4,26,071 वर्श ग्रहण द्वारा उत्पादित पुण्य से समाप्त हो जाने चाहिए। जिसके लिए 43 ग्रहण की आवष्यकता है। खगोल वैज्ञानिकों का ऐसा अनुमान है कि वर्श में सूर्यग्रहण की स्थिति 2 से 5 बार तक आती है। कलियुग के व्यतीत वर्श 5102 वर्शों में क्या 43 ग्रहण नहीं आये होंगे? जबकि 20 मार्च 2015 तक 14 सूर्यग्रहण अभी होंगे। यदि यह माना जाय तो ग्रहण से उत्पन्न पुण्य सिर्फ भारत में ही होता है तो क्या 5102 वर्शों के दौरान भारत में 43 ग्रहण नहीं हुये होंगे ? जबकि चन्द्रग्रहण से उत्पादित पुण्य से कलियुग की आयु कम होना अलग है। इस प्रकार देखने पर कलियुग की आयु लगभग समाप्त हो चुकी है।
खगोल व ज्योतिश विज्ञान के अनुसार उपरोक्त घटनायें युग की समाप्ति और भगवान के अवतरण के समय का सूचक होती हैं। वर्तमान कलियुग की आयु 4,32,000 वर्श मानी गयी है। जिसका प्रारम्भ 18 फरवरी 3102 ई0 पू0 माना जाता है। सर्वज्ञपीठम् कालीमठ, वाराणसी के स्वामी ब्रह्मानन्द नाथ सरस्वती के अनुसार ग्रहण से उत्पादित पुण्य से कलियुग का 10,000 वर्श आयु कम हो जाता है। (देखें- ”अमर उजाला“ इलाहाबाद संस्करण, दिनांक- 11-08-1999 पूर्ण सूर्यग्रहण के अवसर पर प्रकाषित) और 821 वर्श कलियुग का षेश रहने पर कल्कि अवतार का अवतरण माना गया है। इस प्रकार कलियुग का व्यतीत कुल वर्श 5102 वर्श हुआ और यदि कल्कि अवतार अभी होता है तो कलियुग के कुल आयु 4,32,000 में से 5102$821 वर्श घटकर 4,26,071 वर्श ग्रहण द्वारा उत्पादित पुण्य से समाप्त हो जाने चाहिए। जिसके लिए 43 ग्रहण की आवष्यकता है। खगोल वैज्ञानिकों का ऐसा अनुमान है कि वर्श में सूर्यग्रहण की स्थिति 2 से 5 बार तक आती है। कलियुग के व्यतीत वर्श 5102 वर्शों में क्या 43 ग्रहण नहीं आये होंगे? जबकि 20 मार्च 2015 तक 14 सूर्यग्रहण अभी होंगे। यदि यह माना जाय तो ग्रहण से उत्पन्न पुण्य सिर्फ भारत में ही होता है तो क्या 5102 वर्शों के दौरान भारत में 43 ग्रहण नहीं हुये होंगे ? जबकि चन्द्रग्रहण से उत्पादित पुण्य से कलियुग की आयु कम होना अलग है। इस प्रकार देखने पर कलियुग की आयु लगभग समाप्त हो चुकी है।
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