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Friday, December 21, 2012

एकादशी 2013

एकादशी 2013 - Ekadasi 2013 तिथियां

एकादशी या Ekadasi त्योहार पर भगवान विष्णु की पूजा की जाती है. एकादशी एक पवित्र दिन के रूप में माना जाता है. यह हिंदू शास्त्रों में एक विशेष महत्व है. इस खास दिन पर तेजी से अवलोकन एक जीवन बदल सकते हैं. मूल्यवान दिन की आवश्यकता को समझना, AstroSage 2013 एकादशी पर इस लेख उपयोगी विकसित करने का फैसला किया.
Ekadasi 2013 सभी तिथियों पर एकादशी गिर रही है के साथ पूरा किया है. इसके अलावा, आप भी इस अनूठी दिन के बारे में अधिक पता मिल जाएगा. एकादशी का पता लगाने और अधिक पढ़ें.
हिंदुओं का पालन चंद्र कैलेंडर और एकादशी उज्ज्वल के 11 दिन के हर चांद्र मास के अंधेरे पखवाड़े के रूप में के रूप में अच्छी तरह से है. एकादशी हिंदू धर्म में एक शुभ दिन माना जाता है और इस दिन उपवास रखने वास्तव में लाभकारी है.
चांद्र मास दोनों उज्ज्वल के रूप में के रूप में अच्छी तरह से अंधेरे पखवाड़े के शामिल है. इसलिए, एकादशी एक महीने में दो बार गिर जाता है. एक एकादशी जब चंद्रमा पृथ्वी (भू - समीपक) के सबसे करीब है गिर जाता है और जब यह दूर है गिर जाता है (apogee). इसके अलावा, इन उच्च के रूप में के रूप में अच्छी तरह से कम ज्वार ज्वार के समय के रूप में माना जाता है.
बाद सूची 2013 में एकादशी दिखा है:

एकादशी


तिथि व महीनाएकादशी के नाम
जनवरी 8 Safala एकादशी
22 जनवरी Putrada एकादशी
6 फ़रवरी शाट Tila एकादशी
21 फ़रवरी जया एकादशी
8 मार्च विजया एकादशी
23 मार्च Amala एकादशी
6 अप्रैल Paapmochini एकादशी
22 अप्रैल Kamada एकादशी
5 मई Varuthini एकादशी
21 मई मोहिनी एकादशी
4 जून Apara एकादशी
20 जून Nirjala एकादशी
3 जुलाई योगिनी Ekadasi
19 जुलाई Devashayani एकादशी
2 अगस्त Kamika एकादशी
17 अगस्त पवित्र एकादशी
1 सितंबर आजा एकादशी
15 सितंबर पद्म एकादशी
30 सितंबर इंद्र एकादशी
15 अक्टूबर Pampakusha एकादशी
30 अक्टूबर रमा एकादशी
13 नवंबर देव Prabodhini एकादशी
29 नवंबर Utpanna एकादशी
13 दिसंबर Mokshadi एकादशी
28 दिसंबर Safala एकादशी
एकादशी वास्तव में एक बहुत शुभ समय है. एक भगवान का आशीर्वाद दिलकश के लिए इस समय का उपयोग करने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहिए.
एकादशी की संकल्पना एक सर्वशक्तिमान से प्राप्त वरदान के साथ incepted था. प्राचीन समय में, Satyuga, एक Murdhanav नाम दानव, Nadijang के बेटे के युग के दौरान एक कठिन तपस्या के बाद ब्रह्मा जी से वरदान हासिल कर ली. जिसके कारण, यह देवता के लिए उसे हराने के लिए असंभव हो गया. तो, वह अपनी शक्तियों का दुरुपयोग और पराजित सभी देवता और अन्य राक्षसों के साथ उनके पदों की जगह. दु: ख और दर्द में, देवता ब्रह्माजी के लिए मदद के लिए पहुंच गया. हालांकि, ब्रह्माजी भी उन्हें मदद करने में असमर्थ था, तो वह उन्हें Kshir सागर ले लिया (दूध का सागर). सभी देवता कठिन तपस्या सर्वोच्च शक्ति कृपया.
प्रभु किया गया था तब से खुश हैं और उन्हें एक वरदान दिया. तब देवता Chandravati (राक्षसों की भूमि) चला गया राक्षसों को चुनौती देने के. वहाँ वे 1000 साल तक कुछ भी तरह लड़ा. उसके बाद, भगवान थक बन गया है और खुद को एक गुफा में छिपा दिया. लेकिन, दानव उसे गुफा के लिए पीछा किया. उसकी उपस्थिति जानने के बाद वह ध्यान में बैठ गया और उसके सारे ग्यारह इंद्रियों से एक प्रकाश देवी विकसित. दानव उसकी सुंदरता से मुग्ध गया और उसे शादी के लिए प्रस्तावित है, लेकिन देवी ने कहा कि वह एक है जो उसे लड़ाई में हार जाएगा शादी करेगा. वे लड़ाई शुरू कर दिया, लेकिन राक्षस खुद को नहीं बचा सकता है. यह सभी देवता को खुश कर दिया. जब भगवान चेतना प्राप्त की वह सब कुछ पता है और बहुत खुश हो गया.
तो देवी ने कहा, "हे भगवान! मैं अपने ग्यारह होश यही वजह है कि मैं हूँ एकादशी से पैदा हुआ हूँ. और, मैं पैदा हुआ था जब आप Taph यही वजह है कि मैं भी हूँ तपस्विनी में थे. मैं सभी राक्षसों गायब हो गई है. मैं ब्रह्मांड से सभी बुरी शक्तियों का demolisher होगा "
उसे शब्दों द्वारा मंत्रमुग्ध, वह उसे एक वरदान की तलाश करने के लिए कहा. फिर वह उसे उसकी इच्छा और स्वीकार किया है कि वह उसे करने के अंतर्गत आता है सर्वशक्तिमान के लिए पूछा, और कहा कि वह अपने सभी युगों में बेहतर आधा हो जाएगा. यही कारण है कि एकादशी के दिन सर्वोच्च सत्ता में है और लोगों को उनके जीवन के बाहर बुराई मुसीबतों गिराने के लिए यह सबसे अच्छा का उपयोग है.
एकादशी 2013 पर इस लेख के साथ, हम आशा है कि तुम क्या आप एक वर्ष का सबसे अच्छा उपयोग की इच्छा. तो, अग्रिम में अपने वर्ष की योजना शुरू करते हैं.

कुम्भ 2012 राशिफल (चंद्र राशिफल)

                                                     कुम्भ: (गू, गे, गो, सा , सि, सु, से, सो , द)
कुम्भ जनवरी राशिफल- साल की शुरुआत आपके लिए थोड़ी निराशाजनक रहने वाली है. शत्रु पक्ष की ओर से आपके खिलाफ षड़यंत्र किया जा रहा है, सावधानी की दरकार है. बॉस से मतभेद हो सकता है. संतान की ओर से भी कष्‍ट मिलने के योग हैं. माता-पिता के स्‍वास्‍थ्‍य को लेकर भी चिंताएं बनी रहेंगी.
कुम्भ फरवरी राशिफल- आय में उतार-चढ़ाव बना रहेगा. किसी का अडि़यल रवैया आपको खिन्‍न कर सकता है. अपना कीमती सामान संभाल कर रखें, उसके खोने या चोरी होने के संकेत हैं. भाग्‍य आपके साथ नहीं है, इसलिए आपको कड़ी मेहनत करनी होगी.
कुम्भ मार्च राशिफल- 15 तारीख से पहले कोई नया काम शुरू न करें. महीने के दूसरे पखवाड़े में आपके लिए हालात बदलने वाले हैं. कहीं दूर से मिला कोई शुभ समाचार मिल सकता है. रुका हुआ धन आएगा. कानूनी पेंच आपको थोड़ा परेशान कर सकते हैं. नकारात्‍मक लोगों से दूर रहें. विद्यार्थियों को परीक्षा में सफलता मिलेगी.
कुम्भ अप्रैल राशिफल- कोई आपका अपना बन आपको धोखा देने का विचार बना रहा है. इस महीने आपके लिए आय के नए स्रोत खुलेंगे. नौकरी में प्रगति के योग हैं. हालांकि कुछ लोगों के लिए यह इच्‍छानुसार नहीं होंगे. जीवनसाथी एक मजबूत स्‍तंभ की तरह आपके साथ रहेगा.

कुम्भ मई राशिफल- समय अनुकूल है, इसका लाभ उठाइए. कामयाबी के लिए नयी सोच की दरकार है. संतान की ओर से कष्‍ट हो सकता है. जीवनसाथी से आपसी विवाद के चलते परेशानी रहेगी. अधिकारियों से संबंधों का फायदा होगा. नौकरीपेशा लोगों के लिए समय सामान्‍य है. स्‍वास्‍थ्‍य का घ्‍यान रखें.
कुम्भ जून राशिफल- देवयोग से बनते काम बिगड़ेंगे. साहित्यिक क्षेत्र के लोगों के लिए समय बहुत अच्‍छा है. आपको मेहनत का फल मिलेगा. नयी नौकरी के अवसर हैं. शिक्षा के लिए विदेश से बाहर जाने का योग है.
कुम्भ जुलाई राशिफल- सामान्‍य महीना है. किसी भी कागज पर दस्‍तखत करने से पहले उसकी अच्‍छी तरह पड़ताल कर लें. आलस्‍य से दूर रहें. माता-पिता का आशीर्वाद प्राप्‍त करें. मित्रों की सहायता से कई काम बनेंगे.
कुम्भ अगस्त राशिफल- न उधार दें और न लें. आप मानसिक रूप से बहुत सुद्ढ़ महसूस करेंगे. धन आने के नए रास्‍ते खुलेंगे. सेहत की बेहतरी के लिए बाहर खाने से बचें. सूर्योपासना के लाभ होगा.
कुम्भ सितम्बर राशिफल- यह महीना आपके आने वाले जीवन की दिशा निर्धारित करने वाला है. सोच-समझकर फैसला लेना ही बेहतर रहेगा. नया व्‍यवसाय शुरू करने में मित्रों की सहायता लेने से फायदा होगा. स्त्रियों के समय बहुत अच्‍छा है. संतान सुख प्राप्ति के योग हैं.
कुम्भ अक्टूबर राशिफल- भौतिक सुखों में वृद्धि होगी. आय के नए स्रोत खुलेंगे. नौकरी या व्‍यवसाय के सिलसिले में शहर से बाहर जाने के योग हैं. पुरानी परेशानियां अब अलविदा कहने को हैं. नए संपर्कों से लाभ होगा.
कुम्भ नवम्वर राशिफल- यातायात नियमों का पालन करें. तेज वाहन चलाना बहादुरी का काम नहीं है इस बात का ध्‍यान रखें. निवेश के लिए उत्‍तम समय है. सोने की खरीददारी से भविष्‍य में लाभ होगा. अपनी योजनाओं को अमली जामा पहनाने का माकूल समय है.
कुम्भ दिसम्बर राशिफल- छोटी-मोटी समस्‍याओं को हटा दें तो समय आपके साथ है. सार्वजनिक मोर्चों पर आपकी प्रतिष्‍ठा में इजाफा होगा. 15 तारीख के बाद परिवारजनों से विवाद हो सकता है. दूसरे के पक्ष को अच्‍छी तरह सुनकर ही कोई फैसला लें.

Sunday, November 18, 2012

इस छट तैयार किया जाता है

इस छट पुजा पर हार्दिक शुभकामनायें



पर्व के पहले दिन पूजा में चढ़ावे के लिए सामान तैयार किया जाता है
 जिसमें सभी प्रकार के मौसमी फल, कले की पूरी गौर (गवद), इस पर्व पर खासतौर पर बनाया जाने वाला पकवान ठेकुआ (बिहार में इसे खज़ूर भी कहते हैं) नारीयल, मूली, सुथनी, अखरोट, बादाम, इस पर चढ़ाने के लिए लाल/पीले रंग का कपड़ा, एक बड़ा घड़ा जिस पर 12 दीपक लगे हो, गन्ने के बारह पेड़ आदि। पहले दिन महिलाएँ अपने बाल धो कर चावल, लौकी और चने की दाल का भोजन करती हैं और देवकरी में पूजा का सारा सामान रख दिया जाता है, यहीं से छठ पूजा का व्रत शुरू हो जाता है। ‘देवकरी’ स्थान पर काफी सावधानी रखी जाती है। इसे छठ मंईया का पूजा स्थल भी कहा जा सकता है।

जय छ्ठ मंईया की। इस त्यौहार की शुरूवात नहाय-खाय, और खरना से शुरू होती है।
 आईये सबसे पहले यह जाने की नहाय-खाय और खरना क्या होता है।

पर्व के पहले दिन पूजा में चढ़ावे के लिए सामान तैयार किया जाता है जिसमें सभी प्रकार के मौसमी फल, कले की पूरी गौर (गवद), इस पर्व पर खासतौर पर बनाया जाने वाला पकवान ठेकुआ (बिहार में इसे खज़ूर भी कहते हैं) नारीयल, मूली, सुथनी, अखरोट, बादाम, इस पर चढ़ाने के लिए लाल/पीले रंग का कपड़ा, एक बड़ा घड़ा जिस पर 12 दीपक लगे हो, गन्ने के बारह पेड़ आदि। पहले दिन महिलाएँ अपने बाल धो कर चावल, लौकी और चने की दाल का भोजन करती हैं और देवकरी में पूजा का सारा सामान रख दिया जाता है, यहीं से छठ पूजा का व्रत शुरू हो जाता है। ‘देवकरी’ स्थान पर काफी सावधानी रखी जाती है। इसे छठ मंईया का पूजा स्थल भी कहा जा सकता है।


जय छ्ठ मंईया की। इस त्यौहार की शुरूवात नहाय-खाय, और खरना से शुरू होती है। आईये सबसे पहले यह जाने की नहाय-खाय और खरना क्या होता है।

नहाय-खाय: इस पर्व के पहले दिन नहाय-खाय के दौरान व्रतियों द्वारा स्नान कर कद्दू की सब्जी व अरवा चावल का प्रसाद ग्रहण किया जाता है।
 इस अवसर पर व्रती 24 घंटे निर्जला उपवास रखेते हैं।
 तत्पश्चात संध्या अस्ताचलगामी सूर्य को अ‌र्घ्य देंगे।
 चार दिवसीय इस महापर्व के दूसरे दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु आस-पास के नदी, तालाब या सरोवरों में स्नान कर खीर-पूड़ी का प्रसाद भगवान सूर्य को अर्पण करतें हैं।

 सूर्यास्त के पूर्व व्रतियों ने भगवान सूर्य को नमन करते हुए मनोवांछित फल की कामना की जाती है।
 नवनिर्मित चूल्हे पर आम की लकड़ी के द्वारा प्रसाद बनाए जाते हैं।
  इसके साथ ही प्रारंभ हो जाता है
 व्रतियों के घर ‘खरना का प्रसाद’ प्राप्त करने के लिए श्रद्धालुओं के आने-जाने का सिलसिला।
देर रात तक श्रद्धालु व्रतियों के घर आते-जाते हैं।

खरना: खरना के अवसर पर दूध और गुड़ से बने खीर प्रसाद (तस्मई) का काफी महत्व होता है
 व्रती इसे ही ग्रहण करतें हैं,
इसके साथ ही शुरू हो जाता है 36 घंटे का निराहार व्रत इस महाव्रत की बहुत बड़ी मान्यता होती है,
 इस व्रत को करने वाले महिला, पुरुष, बच्चे को समाज में काफी मान और श्रद्धा से देखा जाता है।

इस महापर्व के तीसरे दिन व्रतधरी अस्ताचलगामी सूर्य को नदी या तलाब में खड़ा होकर प्रथम अर्घ्य अर्पित करते हैं।
छठ पर्व के चौथे और अन्तिम दिन पुनः अदयीमान सूर्य को दूसरा अर्घ्य देने के साथ ही यह पर्व समाप्त हो जाता है।
 इस पर्व में ‘ठेकुआ’ (आटा+चीनी या गुड़ से तला हुआ), ईख, मुली, केला, सूप, दौरा, दीप, कलश, पंखा, झाड़ू का विशेष महत्व होता है।
 छठ पुजा के अवसर पर लोग श्रद्धा से प्रसाद भिक्षा के रूप में मांग कर ग्रहण करते हैं।
छठ पर्व के त्यौहार में भिक्षा मांगने का प्रचलन भी है।
 इस पर्व के अवसर पर यदि कोई आपके सामने भिक्षा मांगने आ जाये तो आपकी मनोकामनाएं भी भिक्षा ग्रहण व्रती के साथ स्वतः जुट जाती है।
 आपको कभी ऐसा अवसर मिल जाये कि जब कोई छठव्रती आपसे भिक्षा मांगने आ जाये तो अपनी मनौती के साथ उसके सूप पर भिक्षा दे देना चाहिए।
 आपकी मनोकामना ठीक उसी क्रम में पूरी हो जाती है
 जिस क्रम में आपने भिक्षा दिया है।
 ठीक इसी प्रकार कभी छठ मंईया का प्रसाद मिले तो इसे श्रद्धा से ग्रहण करने से कहते हैं कि “छठ मंईया प्रसन्न होकर आपकी सभी मनोकामनाओं को पूरी कर देती है।


यह बात सही है कि इस पर्व का महत्व बिहार, यु.पी के लोगों में ही अधिक देखा जाता है।
 बिहार,U.P. में रहने वाले बंगाली, मारवाड़ी, और गुजराती बड़ी संख्या में इस त्यौहार में शामिल ही नहीं होते कई परिवार तो यह पर्व मनाने भी लगे हैं।
इस पर्व में लोकगीतों का काफी महत्व आज भी देखा जाता है।
 इस त्यौहार के लोकगीतों को ध्यान से सुना जाये तो मानो समस्त प्राणियों की मंगलकामना गीत हैं ये लोकगीत। इस पर्व में कई जगह गाय(cow) से भी व्रत कराया जाता है।
 इस पर्व की इतनी बड़ी मान्यता है कि कई विद्वान, साहित्यकार, इस पर्व के डाले(दौरी बांस की बनी टोकरी) को (जिसमें प्रसाद, सूप, अर्घ्य देने का समान रखा जाता है)
 को अपने सर पे रख कर घाट तक ले जाते हैं।
 कई व्रतधारी तो पूर्ण रुप से दण्डवत प्रणाम करते हुए घाट तक जाते हैं।
 कहतें हैं कि भारत विचित्रता का देश है,
 यहाँ की संस्कृति विभिन्न स्थानों में भिन्न-भिन्न प्रकार से बदल जाती है,
 जिस तरह यहाँ की बोलियों में कई तरह की मिठास देखने को मिलती है।
बनारस की बोली हो या लखनवी अंदाज, भौजपुरी हो या मैथिली।
 सभी एक से बढ़कर एक हैं। इस चार दिन के त्यौहार में नदी के किनारे मेला भी लगाया जाता है,
 कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है। हाँ !
 इस अवसर को कुछ राजनीति करने वाले दल अपने लाभ के लिये भुनाने का प्रयास भी करते पायें जाते है। जिसके चलते अन्य प्रान्तों में इस त्यौहार को राजनैतिक रंग दिया जाने लगा है।
केरवा जे फरेला घवद से ओह पर सुगा मंडाराय
जे खबरी जनइबो आदित से सुगा देले जुठियाए
जे मरबो रे सुगवा धनुक से सुगा गिरे मुरछाय,
जे सुगनी जे रोवे ले वियोग से आदित होइ न सहाय।

जिस लोकगीतों मे एक ‘सुगनी’ के दर्द को इतनी मार्मिक्ता से दर्शाया गया है, उस बिहारी समाज को कभी बंगाल, महाराष्ट्र तो कभी दिल्ली में प्रताड़ना छेलना पड़ता है।
  शायद इस समाज को देखने का नज़रिया हम अभी तक नहीं बदल पाये हैं।
हम भले ही अपने आपको सभ्य समाज का अंग समझते हों पर हम से कहीं ज्यादा यह समाज मुझे सभ्य दिखाई देता है।
 हमारी भाषा में तो केवल विष ही विष झलकता है। वह राज ठाकरे हो या शीला दीक्षित चाहे वह लालू यादव हो या नितिश कुमार, सब के सब इस समाज के दर्द को आज तक समझने का कभी भी प्रयास नहीं किया, आखिर क्या कारण है जो समाज संस्कृति रूप से हम से भी कहीं ज्यादा शिक्षित है,
 वह आज हम सबके दया का पात्र बना हुआ है।

Thursday, October 11, 2012

21 दिसम्बर, 2012 ई


शुक्रवार, 21 दिसम्बर, 2012 . के बाद शनिवार, 22 दिसम्बर, 2012 .से

पाँचवें, प्रथम और अन्तिम स्वर्णयुग का आरम्भ


1. काल, समय या युग परिवर्तन कब होगा? कैसे होगा और किस मानव षरीर के द्वारा होगा?
2. और भविश्य के प्रति जिज्ञासा मानव स्वभाव का सबसे रूचिकर विशय है।
3. इस आधार पर अनेक व्यापार भी चल रहें हैं।
उपरोक्त प्रष्नों के हल को पाने के लिए हमें मानव सभ्यता के प्रारम्भ से चले आ रहे और समय-समय पर अन्य धर्म षास्त्रों के मान्यताओं तथा भविश्यवक्ताओं के विशय में जानना आवष्यक होगा।
Ø हिन्दू शास्त्र व मान्यता के अनुसार


प्राचीन हिन्दू खगोलीय और पौराणिक पाठ्यों में वर्णित समय चक्र आश्चर्यजनक रूप से एक समान है।


प्राचीन भारतीय भार और मापन पद्धतियाँ,


अभी भी प्रयोग में हैं।


इसके साथ-साथ ही हिन्दू ग्रन्थों में लम्बाई, भार, क्षेत्रफल मापन कह भी इकाईयाँ परिमाण सहित उल्लेखित हैं।


हिन्दू समय मापन (काल व्यवहार) में नाक्षत्रीय मापन, वैदिक समय इकाईयाँ, चाँद्र मापन, ऊँश्ण कटिवन्धीय मापन, पितरों की समय गणना, देवताओं की काल गणना, पाल्या इत्यादि हैं।



हिन्दू पुराण के अनुसार ब्रह्माण्ड का सृजन क्रमिक रूप से सृश्टि के ईष्वर ब्रह्मा द्वारा होता है जिनकी जीवन 100 ब्राह्म वर्श होता है।


ब्रह्मा के 1 दिन को 1 कल्प कहते हैं।


1 कल्प, 14 मनु (पीढ़ी) के बराबर होता है।


1 मनु का जीवन मनवन्तर कहलाता है और 1 मनवन्तर में 71 चतुर्युग (अर्थात 71 बार चार युगों का आना-जाना) के बराबर होता है। ब्रह्मा का एक कल्प (अर्थात 14 मनु अर्थात 71 चतुर्युग) समाप्त होने के बाद ब्रह्माण्ड का एक क्रम) समाप्त हो जाता है और ब्रह्मा की रात आती है।


फिर सुबह होती है और फिर एक नया कल्प षुरू होता है।


इस प्रकार ब्रह्मा 100 वर्श व्यतीत कर स्वयं विलिन हो जाते हैं।


और पुनः ब्रह्मा की उत्पत्ति होकर उपरोक्त क्रम का प्रारम्भ होता है।


वर्तमान समय ब्रह्मा का 58वें वर्श का प्रथम दिन तथा सातवें मनु- वैवस्वत और उसके 28वें चतुर्युग का अन्तिम युग- कलियुग का समय है।
विष्व का सृजन, विनाष और पुनः सृजन प्रत्येक 43,20,000 वर्श के बाद होता है।


जो एक के बाद एक आने वाले चार युग क्रमषः 1. सतयुग (स्वर्णयुग, आयु-1728000 वर्श), 2. त्रेतायुग (रजतयुग, आयु-1296000 वर्श), 3. द्वापरयुग (वाम्रयुग, आयु-864000 वर्श), 4. कलियुग (लौहयुग, आयु-432000 वर्श) है। प्रथम युग के बाद आने वाला युग अपने पहले के युग से कम आयु का होता है। ये चारो युग 25,920 वर्श के चक्र में विभाजित होते हैं। प्रत्येक चक्र में चार राषियाँ क्रमषः कुंभ, वृश, सिंह और वृष्चिक बारी – बारी से आते-जाते हैं। चारो राषि चक्र को संयुक्त रूप से राषि चक्र (जोडिएक साइकिल) कहते हैं। प्रत्येक राषि 25,920 वर्श के चैथे हिस्से 6,480 (या 6,500) वर्श में आना-जाना होता है। इस समय हमारा प्रवेष कुंभ राषि में हो रहा है।
चतुर्युग के युगों में विषेश कला के साथ विश्णु के अवतार होते हैं। वर्तमान चतुर्युग में भगवान विश्णु के अभी तक 9 अवतार क्रमषः मत्स्य, वाराह, नृसिंह, वामन, परषुराम, राम, कृश्ण व बुद्ध हो चुके हैं। दसवाँ कल्कि अन्तिम महाअवतार अभी होना है जो सफेद घोड़े पर सवार होकर हाथ में तलवार लेकर समस्त बुराईयों का नाष करेगें, ऐसी मान्यता है। (इन अवतारों के विशय में हम आगे विस्तृत रूप से पढ़ेगें)
ब्रह्मवैवर्त, विश्णु, भागवत, पद्म, गरूण तथा भविश्य पुराण में भगवान विश्णु के दसवें तथा महावतार ”कल्कि“ का वर्णन है। कहा गया है कि कलियुग षुरू होने के 5000 वर्श बाद, 10,000 वर्शो तक भक्ति का प्रभाव बढ़ेगा। इस प्रकार कलियुग के लगभग 6898 वर्श पहले ही पुरे हो चुके हैं तथा 18 फरवरी, 3102 को ये समाप्त होगा। कलियुग के अन्त से भगवान विश्णु के अवतार से जुड़ी तथा षिव की भविश्यवाणीयां हैं, जो सृश्टि के संहारक व सर्जक हैं।
वर्तमान तिथि – हम वर्तमान में ब्रह्मा के 58वें वर्श में 7वें मनु-वैवस्वत मनु के शासन में श्वेतवाराह कल्प के द्वितीय परार्ध में, 28वें चतुर्युग का अन्तिम युग-कलियुग के ब्रह्मा के प्रथम वर्श के प्रथम दिवस में विक्रम सम्वत् 2069 (सन् 2012 ई0) में हैं। वर्तमान कलियुग ग्रेगोरियन कैलेण्डर के अनुसार दिनांक 17-18 फरवरी को 3102 ई.पू. में प्रारम्भ हुआ था। इस प्रकार अबतक 15 नील, 55 खरब, 21 अरब, 97 करोड़, 61 हजार, 624 वर्श इस ब्रह्मा के सृजित हुए हो गये हैं







3. अन्य के अनुसार
दिनांक 24 अक्टूबर 1995 से 16 जुलाई 2000 तक का समय सर्वाधिक खगोलीय घटनाओं वाला समय रहा है। जिसमें 24 अक्टूबर 1995 अमावस्या दीपावली के दिन पूर्ण सुर्यग्रहण, 18 से 22 नवम्बर 1997 (पाँच दिन) तक आठ ग्रहों का 130 डिग्री के बीच आना फरवरी व मार्च 1999 में एक ही महीनें में दो पूर्ण चाँद, 11 अगस्त 1999 को पूर्ण सूर्य ग्रहण, 18 नवम्बर 1999 को उल्काओं की आतिषबाजी का नजारा, 22 दिसम्बर 1999 को 133 वर्श बाद सबसे बड़ा चाँद, 5 मई 2000 को 26 डिग्री के बीच सूर्य-चाँद सहित पाँच ग्रहों का आना और 16 जुलाई 2000 गुरुपूर्णिमा के दिन ही पूर्ण चन्द्रग्रहण है। इसके अलावा सन् 1995 के अन्त में गणेष जी का दूध पीना तथा उत्तर भारत के षिव मन्दिरों में स्थित षिवलिंगों का रंग बदलना जिससे तीसरे नेत्र के खुलने का अनुमान अलग घटना है। (देखें- ”अमर उजाला“ इलाहाबाद संस्करण 25-6-1999) उपरोक्त अवधि के 1999 में ही सावन मास का मलमास या पुरुशोत्तम मास या अधिक मास या अधिमास के रुप में षिवभक्ति के लिए अतिरिक्त माह हुआ है। भारत के लिए उपरोक्त समय में ही स्वतन्त्रता और संविधान के 50 वर्श भी पूरे हुए हैं। 14-15 अगस्त 1947 की रात जब भारत स्वतन्त्र हुआ था तब आठों ग्रह सहित सूरज चाँद अर्थात् पूरा सौरमण्डल भारत के आकाष में अनुपस्थित था जबकि उपरोक्त समय के स्वतन्त्रता दिवस 15 अगस्त 1999 को मंगल और चाँद को छोड़ सभी ग्रह और तारे पहली बार लाल किले पर झण्डा फहराने के समय उपस्थित थे। (देखें- ”दैनिक जागरण“ वाराणसी संस्करण, दिनांक 15-08-1999) इतना ही नहीं उपरोक्त समय में ही ईसाई, ईस्लाम और हिन्दू का महत्वपूर्ण दिन क्रमषः नया वर्श 1 जनवरी 1998, रमजान का प्रारम्भ और वृहस्पतिवार (विश्णु का दिन) प्रथम बार एक ही दिन संयोग हुआ। उपरोक्त समय में ही ऐतिहासिक षिकागो वकृतता के बाद स्वामी विवेकानन्द के भारत लौटने का 100 वर्श भी पूर्ण हुआ। उपरोक्त समय में ही षिकागो वकृतता के समय स्वामी विवेकानन्द के उम्र 30 वर्श 7 माह 29 दिन के बराबर उम्र लवकुष सिंह ”विष्वमानव“ ने 15 जून 1998 को पूर्ण किया है। 26 अक्टुबर 2000 को दिपावली तथा मुसलमानो का ज्योति पर्व ”मेराजुन्नबी“ की एकता। 17 नवम्बर 2000 को लियो (सिंह) राषि की ओर से उल्कापात, 13 दिसम्बर को जेमिनी (मिथुन) राषि की ओर से उल्कापात भी अलग घटना है।
खगोल व ज्योतिश विज्ञान के अनुसार उपरोक्त घटनायें युग की समाप्ति और भगवान के अवतरण के समय का सूचक होती हैं। वर्तमान कलियुग की आयु 4,32,000 वर्श मानी गयी है। जिसका प्रारम्भ 18 फरवरी 3102 ई0 पू0 माना जाता है। सर्वज्ञपीठम् कालीमठ, वाराणसी के स्वामी ब्रह्मानन्द नाथ सरस्वती के अनुसार ग्रहण से उत्पादित पुण्य से कलियुग का 10,000 वर्श आयु कम हो जाता है। (देखें- ”अमर उजाला“ इलाहाबाद संस्करण, दिनांक- 11-08-1999 पूर्ण सूर्यग्रहण के अवसर पर प्रकाषित) और 821 वर्श कलियुग का षेश रहने पर कल्कि अवतार का अवतरण माना गया है। इस प्रकार कलियुग का व्यतीत कुल वर्श 5102 वर्श हुआ और यदि कल्कि अवतार अभी होता है तो कलियुग के कुल आयु 4,32,000 में से 5102$821 वर्श घटकर 4,26,071 वर्श ग्रहण द्वारा उत्पादित पुण्य से समाप्त हो जाने चाहिए। जिसके लिए 43 ग्रहण की आवष्यकता है। खगोल वैज्ञानिकों का ऐसा अनुमान है कि वर्श में सूर्यग्रहण की स्थिति 2 से 5 बार तक आती है। कलियुग के व्यतीत वर्श 5102 वर्शों में क्या 43 ग्रहण नहीं आये होंगे? जबकि 20 मार्च 2015 तक 14 सूर्यग्रहण अभी होंगे। यदि यह माना जाय तो ग्रहण से उत्पन्न पुण्य सिर्फ भारत में ही होता है तो क्या 5102 वर्शों के दौरान भारत में 43 ग्रहण नहीं हुये होंगे ? जबकि चन्द्रग्रहण से उत्पादित पुण्य से कलियुग की आयु कम होना अलग है। इस प्रकार देखने पर कलियुग की आयु लगभग समाप्त हो चुकी है।

Tuesday, September 18, 2012

सीता का हरण

रावण एक राक्षस तथा लंका का राजा था।
रामायण के अनुसार, सीता और लक्ष्मण कुटिया में अकेले थे तब एक हिरण की वाणी सुनकर सीता परेशान हो गयी। वह हिरण रावण का मामा मारीच था|




उसने रावण के कहने पर सुनहरे हिरण का रूप बनाया|
सीता उसे देख कर मोहित हो गई और श्रीराम से उस हिरण का शिकार करने का अनुरोध किया|
श्रीराम अपनी भार्या की इच्छा पूरी करने चल पडे और लक्ष्मण से सीता की रक्षा करने को कहा| मारीच श्रीराम को बहुत दूर ले गया| मौका मिलते ही श्रीराम ने तीर चलाया और हिरण बने मारीच का वध किया|
मरते मरते मारीच ने ज़ोर से "हे सीता !
हे लक्ष्मण" की आवाज़ लगायी|

उस आवाज़ को सुन सीता चिन्तित हो गयीं और उन्होंने लक्ष्मण को श्रीराम के पास जाने को कहा|
लक्ष्मण जाना नहीं चाहते थे, पर अपनी भाभी की बात को इंकार न कर सके| लक्ष्मण ने जाने से पहले एक रेखा खीची, जो लक्ष्मण रेखा के नाम से प्रसिद्ध है।


Thursday, May 10, 2012

Thursday, April 12, 2012

ऐसी वाणी बोलिए…




ऐसी वाणी बोलिए…



बेजामिनफ्रैंकलिनने अपनी सफलता का कारण बताते हुए कहा था,

मैंने तय किया है कि किसी भी व्यक्ति के बारे में बुरा नहीं बोलूंगा और जितना भी बोलूंगा, वह उस व्यक्ति की अच्छाइयों के बारे में ही होगा।
वाणी के इसी संयम को अध्यात्म में वाचिक तप कहा जाता है अर्थात अपनी वाणी पर कठोर वचनों को न आने देने का प्रयास। श्रीमद्भगवद्गीतामें तीन प्रकार के तप गिनाए गए हैं-
शारीरिक तप, वाचिक तप और मानसिक तप। वाचिक तप के बारे में उल्लेख है,

उद्वेग उत्पन्न न करने वाला वाक्य बोलना,
प्रिय,
हितकारकऔर सत्य वचन बोलना और स्वाध्याय करना वाणी का तप कहलाता है।

हमारे जीवन में वाणी के महत्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इसको वश में करने से व्यक्ति बहुत ऊंचा उठता है।
इसके विपरीत अनियंत्रित वाणी वाले व्यक्ति को अमूमन जीवन में सफलता नहीं मिल पाती।

जब व्यक्ति अपनी वाणी से किसी को ठेस नहीं लगाता और सदैव मीठा बोलता है,
उसके इष्ट-मित्रों का दायरा अधिक होता है

और लोगों के सहयोग व समर्थन के कारण वह अधिक शक्तिशाली बनकर उभरता है।

इसके विपरीत कटु वचन बोलने वाला जीवन में अकेला पडता चला जाता है।
सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य के लिए वाचिक तप का अत्यंत महत्व है।
गीता में कर्म के तीन साधन बताए गए हैं,

जिनमें एक साधन वाणी भी है। ऋग्वेद के एक मंत्र का आशय है
कि जिस प्रकार छलनी में छानकर सत्तू को साफ करते हैं,
वैसे ही जो लोग मन,
बुद्धि अथवा ज्ञान की छलनी से छान कर वाणी का प्रयोग करते हैं,

वे हित की बातों को समझते हैं अथवा शब्द और अर्थ के संबंध ज्ञान को जानते हैं।

जो बुद्धि से शुद्ध कर के वचन बोलते हैं, वे अपने हित को भी समझते हैं
और जिस को बात बता रहे हैं, उसके हित को भी समझते हैं।

सोच-समझकर शब्दों का उच्चारण या बोलने में ही,
कहने और सुनने वाले का हित-भाव छिपा हुआ है।

वाणी में आध्यात्मिक और भौतिक दोनों प्रकार के ऐश्वर्य निहित रहते हैं।

मधुरता से कही गई बात हर प्रकार से कल्याणकारी होती है।

परंतु वही बात कठोर व कटु शब्दों में बोली जाए,
तो एक बडे अनर्थ का कारण बन जाती है।

आज के समय में,
जब कठोर वाणी के कारण रोड रेजजैसे अनेक अपराध बढ रहे हैं,
ऐसे समय में वाणी का संयम बहुत ही जरूरी है।

आज के आपाधापी के समय में यदि हम सदा मधुर,
सार्थक और चमत्कारपूर्ण वचन नहीं बोल सकते,

तो कम से कम वाणी में संयम का हमारा प्रयास अवश्य होना चाहिए।

महात्मा विदुर ने कहा है

कि कटु वचन रूपी बाण मुख से निकल कर दूसरों के मर्मस्थलोंको घायल कर देते हैं,
जिसके कारण घायल व्यक्ति दिन-रात दुखी रहता है।

उनका परामर्श है कि ऐसे कटु वाग्बाणोंका त्याग करने में अपना और औरों का भला होता है।
बाणों से हुआ घाव भर जाता है,

कुल्हाडे से काटा गया वृक्ष फिर उग जाता है,
लेकिन वाणी से कटु वचन कहकर किए गए घाव कभी नहीं भरते।

इसलिए जो मनुष्य कठोर वचन बोलता है,
वह सिर्फ अपने बारे में सोचता है,
दूसरों के बारे में नहीं।

स्वार्थी नहीं, बल्कि परमार्थी बनने के लिए आपको कठोर वचनों को छोडना ही पडेगा।
मनुस्मृति में मनुष्य के जीवन के लिए जरूरी दस बातें बताई गई हैं,
जिनमें पहली जो चार बातें हैं,
वे बोलने के संबंध में ही हैं।
जिनमें कहा गया है

कि हम कठोर न बोलें।
कोई भी बात मधुरता से,
मृदुलतासे और अपनी वाणी में अपने हृदय का रस घोल कर कहनी चाहिए।
कठोर वाणी का तो पूरी तरह परित्याग करना चाहिए।

वह मनुष्यों में सबसे अधिक अभागा है,
जो कठोर शब्दों द्वारा लोगों के मर्मस्थलोंको विदीर्ण करता है।

हमारे मनीषियोंने बार-बार कहा है
कि जो व्यक्ति दूसरों के प्रति कडे शब्दों का व्यवहार करता है
और पर-निंदा करता है, वह ऐसा पापाचरणकरता हुआ शीघ्र ही विपत्तिायोंमें फंस जाता है।

इसलिए न तो किसी को अपशब्द कहे,
न दूसरों का अपमान करें और न दुष्ट लोगों की संगति करें।
रूखी, कठोर व दूसरों को पीडा पहुंचाने वाली वाणी का त्याग होना चाहिए,
क्योंकि मनुष्य की वृद्धि और विनाश उसकी जिज्जाके अधीन होते हैं।
मनुष्य का मान-अपमान,
उसका आदर-अनादर, उसकी प्रतिष्ठा-अप्रतिष्ठा सब उसकी जिज्जाके वशीभूत होते हैं।

वाक-कुशलता बुद्धिमान का एक प्रशंसनीय लक्षण होता है।

विदुर ने लक्ष्मी व यश दिलाने वाले सात लक्षण बताए हैं,
जिनमें एक मधुर वाणी भी है। जिस मनुष्य में यह गुण होता है,
वह अपने विरोधियों और शत्रुओं को भी मित्र बना लेता है।

कटु वचन नासूर की तरह प्रेम को खा जाते हैं।

गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है,
रोष न रसना खोलिए,
बरुखोलियतलवार.सुनत मधुर परिनामहित, बोलियवचन विचार.।

अर्थात भले ही तुम तलवार खोलो, परंतु रोष में आकर अपनी जिज्जामत खोलो।
जो बात सुनने में मधुर हो और परिणाम में हितकारी हो,
ऐसे ही वचन विचारपूर्वक कहने चाहिए। वाणी का उचित प्रयोग ही सुखकारी होता है।

जिन लोगों के मुख पर प्रसन्नता होगी,
हृदय में दया होगी, वाणी में मधुरता होगी,
कत्र्ताव्यमें परोपकार होगा,
वे सभी के लिए वंदनीय होते हैं।

मीठे वचनों का सुख लाभकारी है।

हमें यह प्रयास करना चाहिए कि हमारा जीवन ज्ञान,
निर्मलता,
शक्ति व शुभ वाणी से अलंकृत हो।

हम जिज्जापर संयम साध लें।




श्रीमद्भागवत ज्ञान की गंगा




अमृतसर, निज प्रतिनिधि।
प्रयत्न करने के बावजूद मानव जब निराश हो जाता है

तो उस समय मनुष्य को श्रीमद्भागवत की शरण में आ जाना चाहिए।


तभी उसको एक अनुभूति का अनुभव होने लग जाएगा।
उक्त प्रवचन स्वामी परमानंद गिरि जी महाराज जी की शिष्या साध्वी कल्पना ने नववर्ष के पहले दिन अजय सीनियर सेकेंडरी स्कूल गोपाल नगर में शुरू हुई
श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह ज्ञान यज्ञ में भक्तजनों को संबोधित करते दिए।
उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत मे ही ज्ञान की गंगा है।
कथा आठ जनवरी तक रोजाना दोपहर तीन बजे से शाम छह बजे तक चलेगी।